छोटे छोटे शुक्रिये

  • संतराम बजाज

कुछ दिनों की बात है, मैं कुछ दुखी मन से बड़ी बोरियत महसूस कर रहा था|

हुआ यूं कि कालिज के एक सहपाठी से अचानक मुलाक़ात हो गई|वह बहुत ‘बड़ा’ आदमी बन गया था, अर्थात बहुत पैसा कमा रहा था| पड़े तपाक से मिला, वही पुरानी कालिज की बातें, जवानी के किस्से -बातें शुरू हो गईं|

उस का घर पास ही था, उस ने आग्रह किया कि चाय पी कर जाएँ|

घर में उन की पत्नी भी थीं| ऐसा लगा कि उन पर दौलत का ‘नशा’ कुछ ज़्यादा ही चढ़ा हुआ था| मुझे इम्प्रेस करने के लिए, घर के ‘टूर’ पर ले गईं| कमरे, कमरों में लगे फर्नीचर की तारीफें, कि कहाँ से लिया है और खास आर्डर पर बनवाया है| दीवार पर लगीं पेंटिंग का ब्योरा भी दिया| एक दीवार पर छोटे से फ्रेम में एक हाथ से लिखा हुआ एक पत्र था| बताया गया कि यह महात्मा गांधी के हाथ की लिखी चिट्ठी है, जो  उन्होंने ४ हजार डॉलर में खरीदी है |

बैकयार्ड में टेनिस कोर्ट और swimming pool और 4 कारों का गेरेज, तहखाने में पार्टी रूम, बार,  जिस में दर्जनों तरह की व्हिस्की और वाइन की बोतलें सजी हुई थीं|

वे साथ में ‘रनिंग कमेंट्री’ भी देती जाती थीं|  

मेरे मित्र थोड़ा एम्बेरेस फील कर रहे थे|

मैं चाय, जिस के साथ केक पेस्ट्री और ड्राई फ्रूट थे, पीकर बाहर आया|

अपने मित्र की ठाटबाट  देख कर मन कुछ अजीब सी ईर्षा और दुखद भावनाओं में डुबकियां लगाने लगा|ईर्षा थी कि वह क्लास में करीब करीब सब से नीचे होते हुए भी इतना कामयाब हो गया और दुःख इस बात का कि हम कक्षा में टॉप पर होते हुए भी ‘मास्टरी’ से आगे नहीं बढ़ पाए|

“अध्यापक होना बड़े गौरव की बात है, ‘देश के भविष्य’ को बनाते हैं ये, गुरु का स्थान बहुत ऊंचा होता है, “गुरु, गोबिंद दोनों खड़े, का के लागूं पायें, बलिहारी गुरु आपने गोबिंद दियो बताये” आदि आदि, सुन सुन कर कान पक गए हैं, इन चिकनी-चुपड़ी बातों से भला पेट भरता है क्या?

वास्तविकता क्या है, वे गुरुकुल वाली बाते तो रामायण और महाभारत के जमाने की हैं|

आजकल तो पैसा ही प्रधान है| जीवन में कोई ख़ास कॉन्ट्रिब्यूशन की ही नहीं | टीचर भी रहे तो नाकाम रहे शायद, क्योंकि सरकार ने हमें  कोई तमगा आदि नहीं दिया| एक छोटे से घर के इलावा कुछ बना नहीं पाए|अपने बच्चों तक को ढंग के स्कूल में पढ़ा नहीं सके|

हम से अच्छे तो वह मास्टर रुलिया राम निकले जिन्होंने एक ट्यूशन स्कूल खोल ढेरों नोट कमाए| और हम आदर्शवादी – ‘न माया मिली न राम’- इतने वर्ष बच्चों को पढ़ाया परन्तु उन में से बहुत सारे शायद छोटी मोटी जॉब्स कर रहे होंगे और मन ही मन मुझे और मेरे ही जैसे उन के दूसरे अध्यापकों को कोस रहे होंगे|”

इसी उधेड़-बुन में खोया हुआ रेलवे स्टेशन की ओर चल पड़ा और एक बैंच पर बैठा बड़ी हीन-भावना में बहते हुए इसी सोच में डूबा था कि एक आवाज़ ने चौंका दिया,

“क्या आप मिस्टर बजाज हैं?”

“हाँ, पर मैं ने आप को पहचाना नहीं|”

“मैं डेविड, आप का पुराना विद्यार्थी |”

“भई, विद्यार्थी तो कई थे, माफ़ करना याद रखना मुश्किल है”  

“याद है जिसे आप क्लास से निकाल बाहर खड़े कर दिया करते थे,” डेविड मुस्कराते हुआ बोला|

मुझे बड़ी शर्म महसूस हुई, बस ज़बरदस्ती की मुस्कराहट चेहरे  पर ला कर उस की ओर देखा|

“ मैं वाकई शरारती हुआ करता था, ”वह भी हंस दिया |

“आजकल अच्छी जॉब है मेरे पास, आप के कारण”

“मेरे कारण?”

“हाँ, सर जी| पढ़ाई और डिसिप्लिन, दोनों ही बहुत काम आये, थैंक्स|”

सुन कर अच्छा लगा |

“सर, आप क्रिकेट मैच देखने जा रहे है क्या?”, डेविड ने बात बदलते हुए पूछा|

“नहीं, कोई ख़ास इंटरेस्ट नहीं|”

“कमाल है! ऑस्ट्रेलिया और इंडिया का मैच और आप को इंटरेस्ट नहीं| मैं तो वहां ही जा रहा हूँ| आप भी चलिये|”

“नहीं डेविड, अब तो टिकट भी नहीं मिलेगी|”

“सर, आप चिंता न करें| उस की ज़रुरत ही नहीं है| मेरे पास वहां की मेम्बरशिप है| आप मेरे गेस्ट के तौर पर चलेंगे|”

मैं अवाक सा उसे देखने लगा कि कल का छोटा सा एक शरारती बालक कितना आगे निकल गया है| मैं ने हाँ में सिर हिला दिया|

डेविड का चेहरा खुशी से चमक उठा, “सर, मैं आप का बहुत आभारी हूँ कि आप ने मेरी बात मान ली | आप नहीं जानते कि मुझे इस से कितनी खुशी मिली है |”

मेरा भी मूड कुछ ठीक हुआ|

मैच के दौरान, मेरा ध्यान खेल में कम था | मैं सोचने लगा कि ऐसे छोटे छोटे कई किससे  मेरे साथ हुए थे, जिन्हें मैं ने कभी गंभीरता से नहीं लिया और न ही उन के पीछे छिपे प्यार और स्नेह को, जो शुक्रिये के तौर पर था|

वह Macdonald में काम करने वाली लड़की, जिस ने मेरे आर्डर में एक फ्राईज़ का फालतू पैकट डाल दिया था| जब मैं ने उसे बताया कि उस ने ग़लती  से मुझे वह दिया जो मैं ने न तो आर्डर किया है न ही उस के पैसे दिए हैं, तो वह बोली, “सर यह आप को शुक्रिये के तौर पर हैं, मैं आप की स्टूडेंट रही हूँ|”मु झे उस समय बड़ा अजीब लगा था, लेकिन उसे कितनी खुशी हुई होगी!

और ऐसा ही मैं एक बार एक ‘फिश एंड चिप्स’ की दूकान में गया तो वहां के नौजवान मालिक ने पैसे लेने से इनकार करते हुए बताया कि वह हमारा विद्यार्थी रहा है और अब उस ने यह शॉप खोल रखी है|हम ने उसे बधाई दी कि वह अपनी हिम्मत और स्वाभिमानता से एक अच्छा व्यवसाय चला रहा है और उस के चेहरे पर खुशी देख हमें भी अच्छा लगा|

अब आप कुछ भी कहिये कि यह कोई बड़ी बात नहीं याकि हमें ऐसी छोटे मोटे मुफ्त की चीज़ें स्वीकार नहीं करनी चाहिए थीं | लेकिन जिस प्यार और स्नेह की भावना से ये दिए गए थे, न लेना उन के दिल को ठेस पहुंचाना होता |

इसी तरह कुछ और बातें याद आईं| वह ऐयरपोर्ट पर कस्टम आफीसर ने जब पासपोर्ट चैक करते वक्त याद दिलाया कि वह भी हमारा स्टूडेंट रहा है|

एक बार अस्पताल में एक नर्स, जो हमारी स्टूडेंट निकली, ने हमारी खूब देखभाल की|ऐसे ही बैंक में एक ‘टैलर’ ने सहायता की| एक बार पुलिस वालों से भी पाला पड़ गया, पर वार्निंग ले बच निकले|  

कहने का मतलब है कि जहाँ भी जाते हैं, शॉप्स पे, अस्पताल में, ट्रेन में,  कोई न कोई मिल ही जाता है | इतने सारे बच्चों को पढ़ाने में  चाहे रत्ती भर ही सही, कुछ न कुछ तो हमारा भी योग दान है, हमें यह देख कर तसल्ली होनी चाहिये थी|

हमारे लिए ये छोटे छोटे शुक्रिये ही बहुत हैं| क्या हुआ जो हम ने गांधी जी की चिट्ठी दीवार पर नहीं लटकाई, क्या हुआ यदि हमारे पास दो तीन फ़्लैट या मकान नहीं है, या बैंक में भारी पूँजी नहीं है, हमें अपने आप पर गर्व होना चाहिए कि हम ने भी देश को काम करने वाले युवा तैयार कर के दिए हैं|भले ही वे किसी कम्पनी के CEO न हों, भले ही वे Einstein नहीं है बल्कि सड़क बनाने के काम में भरी दुपहर में पसीना बहा रहे हों, हमें उन पर भी गर्व है कि वे अपनी क्षमता के अनुसार समाज को कुछ दे रहे हैं|    

एक बच्चे की पढाई में केवल एक टीचर तो नहीं होता, उसी प्रकार एक टीचर सैंकड़ों या हज़ारों विद्यार्थियों के सम्पर्क में आता है| हम सब एक दूसरे से कुछ न कुछ सीखते हैं | अब आगे चल कर कौन क्या बनता है वह सिर्फ टीचर पर ही निर्भर नहीं होता|हम सब अपनी अपनी भूमिका बिना किसी लालच के निभा दें, इसी में हमें संतोष होना चाहिए|बूँद बूँद से नदी बनती है, सो यदि हमारे प्रयास से किसी के जीवन में रत्ती भर भी सुधार आता है तो यह कोई छोटी बात नहीं है|  

यह सब याद कर के मन काफी हल्का हो गया और अपने नकारात्मक विचारों की जगह स्वाभिमान ने ले ली|

मैच समाप्ती पर हम ने डेविड का प्रसन्नतापूर्वक धन्यवाद किया|हमें प्रसन्न देख, डेविड भी खुश था|

वह शायद समझ रहा था कि हम भारत की जीत के कारण खुश थे, जबकि वास्तव में हमें तो मैच का पूरा स्कोर भी पता नहीं था|

सत्य तो यह था कि हमारी विचार-धारा का काया-कल्प करने में डेविड के उस एक छोटे से शुक्रिये का बहुत बड़ा हाथ था|

Short URL: http://www.indiandownunder.com.au/?p=12450

Posted by on Jan 25 2019. Filed under Community, Featured, Hindi, Humour. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed

Search Archive

Search by Date
Search by Category
Search with Google