हाय रे ये मजबूरियाँ …

 

संतराम बजाज

 

अब मजबूरी तो मजबूरी है, अर्थात जो बात आप के वश में नहीं है या आप पर थोपी जा रही और आप को करनी पड़ती है अपनी इच्छा के विरुद्धजैसे दफ्तरों में बाबू लोग रिश्वत देने पर ही आप का काम करे, या बाज़ारों में  सडक पर सामान बेचने के लिय गुंडा लोग ‘हफ्ता’ वसूली करें|

और भी कई तरह की मजबूरियां हो सकती हैं| सिगरेट और तम्बाखू का सेवन और अधिक शराब पीना बड़ा हानिकारक है, लेकिन काफी लोगों की यह भी एक मजबूरी बन जाती है| “छुट्ती नहीं है ज़ालिम मुंह को लगी हुई” वाली बात !

हर एक के जीवन में कभी न कभी कोई न कोई मजबूरी तो आती ही रहती हैआजकल भारत में कई किसान फसलें खराब होने पर कर्जा वापस न देने से तंग, आत्महत्या करने तक मजबूर हो गए हैं| बड़े दुःख की बात है|

कुछ लोग अपनी आदत से भी मजबूर होते हैं,जैसे झूठ बोलना, चोरी करना|

कुछ और भी आदतें हैं जो मजबूरी बन जाती हैं| बहू की सास से लड़ाई, गरीब की भूख से लड़ाई, मरीज़ की बीमारी से लड़ाई – कुछ ऐसे  उदाहरण हैं मजबूरी के|

क्या इशक करना भी मजबूरी हो सकती है? हाँ वह कहते हैं न, ”प्यार किया नहीं जाता,हो जाता है” और फिर सोहनी की तरह कच्चे घड़े पर, मौत से लापरवाह दरिया  पार करने पर मजबूर कर देती है |    

राजनीति में तो अक्सर कई प्रकार की मजबूरियाँ आती हैं जिन्हें वे बड़ी ढिठाई के साथ हँसते हँसते सह जाते हैंअभी ताज़ा ताज़ा किस्सा भारत के कर्णाटक में हुआ| मोदी सरकार को हर हाल में हराना कांग्रेस पार्टी का लक्ष्य या मजबूरी – कु्छ भी कहिये – बन चुका है | इस के लिए उन्हों ने अपने से आधी सीटों वाली पार्टी को मुख्यमंत्री का पद सौंप दियाइस से एक बात और सिद्ध हो जाती है की मजबूरी कभी कभी ‘खुशियाँ’ भी लाती है|

बड़े लोगों की बड़ी मजबूरियाँरामायण काल से आजतक, इतिहास भरा पड़ा  है| महाराज दशरथ के वचन पालन  की मजबूरी ने राम को १४ वर्ष जंगलों में भेजा और उन के अपने प्राण लिए |

हमें क्या लेना देना कि ब्रिटेन की महारानी इल्ज़बेथ जो ९२ वर्ष की हो चुकी है, की क्या मजबूरी है कि वह राज गद्दी अपने बड़े  बेटे प्रिंस चार्ल्स, जो इंतज़ार करते करते ७० वर्ष का हो गया है, को दे नहीं रही हैं|

भारत में सोनिया गांधी, इस मामले में तेज़ निकलीं| उन्होंने ने राहुल को अपना कांग्रेस-प्रधान का ‘ताज’ पहना दिया| १४ वर्ष पहले उन्होंने अपना प्रधान मंत्री  का ‘ताज’ डा: मनमोहन सिंह को दिया था जो कु्छ लोगों के अनुसार उनकी  संविधानक मजबूरी थी|(राहुल भी जवान नहीं हुआ था!)

२०१४ में नरेंद्र मोदी ने चुनाव जीत कर उन्हें मजबूर कर दिया  कि वे कुछ देर और इंतज़ार करें राहुल के प्रधान मंत्री बनने का|

डा: मनमोहन सिंह जी को कम बोलने की आदत थी, लोगों ने उसे मजबूरी का नाम दे दिया जबकि प्रधान मंत्री मोदी जी उस के विपरीत बहुत बोलते हैं तो भी लोग बातें बनाते हैं|   

चलिये, बीमारी से उत्पन्न मजबूरियों की ओर चलते हैं|  

Diabetes बहुत ही नामुराद बीमारी है और इस का कोई इलाज नहीं है| हाँ इस को नियंत्रण में रखा जा सकता है|

कल एक विशेषज्ञ डॉक्टर को सुनने का मौका मिला, जिन के साथ में उन के सहयोगी डॉक्टर, जो एक मशहूर cardiologist हैं, ने इस बात की मज़ाक़ मज़ाक़ में वार्निंग दी थी कि आप लोग इस का इलाज ढूँढने नाई के पास न जाएँ और अपने मित्रों और नाई के बताये हुए नुस्खों से दूर रहें| नाई की बात पर लोग खूब हँसे|

लेकिन सच्चाई यह है कि डॉक्टरों की भारी फीसों और महंगे २ टैस्ट का बोझ, आम आदमी को नाई को पहला ‘स्टॉप’ बनाने पर मजबूर कर देते हैं|

और फिर भई! नाई कोई छोटी मोटी ‘चीज़’ तो है नहीं कि उसे ignore किया जाए और उस की बात को नकारा जाये | वह नहीं तो उस का कोई न कोई customer मिल जाएगा जो एक आध नुस्खा आप को बता देगा| देखा! बिना फीस के काम बन गया!!

गरीब लोग झाड-फूंक करने वाले नक़ली बाबों के चक्कर में फंस जाते है या फिर झोला छाप’ डॉक्टरों के पास – यह उन की मजबूरी ही तो है|

अब बीमारी कोई भी हो, सब से पहले तो दवाईयों की ही बात होगी|  एक बार शुरू हुई तो ज़िन्दगी भर खानी पड़ेगी | उन के side effects, रात को बार बार बाथरूम आदि, आदि हाय रे मजबूरी!  

डॉक्टरों के अनुसार Exercise बहुत ज़रूरी हैयोगा कीजिये, ट्रेडमिल और साइकिलिंग, सैर पर जाईये| डॉक्टर साहब के अनुसार हर रोज दस हज़ार क़दम चलना होगा| हमारी  मुश्किल यह कि हम यदि एक हज़ार भी चल लिए तो गनीमत है| हमारी मजबूरी कि हमारे घुटने cooperate नहीं करते|

हम ने घबरा कर डॉक्टर साहब से सवाल कर डाला कि “डॉक्टर साहब क्या इस  में कोई उमर का फेक्टर भी शामिल है, अर्थात बूढ़े बुज़ुर्ग कुछ कम करें तो चलेगा|” उन का दो टूक  जवाब – ‘सब के लिए दस हज़ार!’|  हम बस यह ही कह पाए कि दस हजार से पहले ही हम ‘drop dead’ हो जायेंगे|

लोग हमारी इस बात पर हँसे परन्तु हमें तो पसीने छूट रहे थे|

और भई! जब सब  senior discount  देते हैं तो ये क्यों नहीं?

जिन को डायबिटीज है, उन के लिए नंगे पैर चलना भी खतरे की निशानी है| अक्सर diabetic को शरीर के कुछ हिस्सों में दर्द आदि का आभास नही होता और इन्फेक्शन का ख़तरा बढ़ जाता है|

एक और मजबूरी, जो  मरीज़ की नहीं बल्कि उस के परिवार वालों की होती है, वह है Dementia की बीमारी में | इस का  भी कोई इलाज  नहीं है और मरीज़ इस में अपनी याददाशत खो देता है, किसी को पहचान नहीं पाता, यहाँ तक कि अपनी देख भाल भी नहीं कर पाता|

आजकल की एक बहुत बड़ी मजबूरी है insurance यानी बीमा| ज़रूरत हो न हो, ये आप लोगों को मौत का, दुर्घटना का,चोरी का डर दिखा कर आप को मजबूर कर देते हैं | लेख के शुरू में मैं  ने ‘हफ्ता वसूली‘ का ज़िकर किया था| वह क्या है ? है तो बीमा ही बल्कि यह डायरेक्ट बीमा है जो आप चोरों, डाकुओं से करते है और आप को तुरंत प्रोटेक्शन मिलती है – कोई क्लेम फ़ार्म भरने की ज़रुरत है न ‘नो क्लेम बोनस’ के खोने का डर| कहते हैं चोर बड़ी ‘इमानदारी’ के साथ धंधा करते हैं!

ऐसा ही एक और धंधा चला हुआ है, जिसे ‘समाज सेवा’ भी कह सकते हैंबिहार और यूपी में ख़ास तौर पर, छात्रों को परीक्षा में नक़ल कराने वाले ‘प्रोफेशनल’ हैं, जो थोड़ी फीस लेकर उन छात्रों की सहायता करते हैं, जो पढाई लिखाई में कमज़ोर होते हैं या टॉप का परिणाम पाना चाहते हैं  और बहुत से माता-पिता इसे अन-देखा करने पर मजबूर हो जाते हैं|

मजबूरी का नाम ‘महात्मा गांधी’ कह कर काम मत कीजिये बल्कि हिम्मत और सूझ-बूझ से काम ले समस्याओं को हल करें|

वैसे मेरी समझ में यह नहीं आता की लोग मजबूरी का नाम महात्मा गांधी के साथ क्यों जोड़ते हैं| इसलिए तो नहीं कि वे हर समस्या का हल शांतिपूर्वक चाहते थे पर जब सारे रास्ते बंद हो जाते थे तो वह सत्याग्रह और अहिंसा का रास्ता मजबूरी में अपनाते थे| भारत का विभाजन भी शायद इसी मजबूरी का नतीजा था|

खैर छोडिये, ये बातें हम इतिहास्कारों के लिए छोड़ देते हैं |

अब चलते हैं खाने पीने की ओर|

खाने में  प्रोटीन, विटामन, फल, हरी सब्जियां, Omega 3  आदि आदि, होने ज़रूरी है| शूगर कम से कम होनी चाहिये|

हल्दी राम’ की पैकटों में बंद कचौरियों की बजाये घर का ‘हेल्दी’ भोजन खाएं|

हमारी मजबूरी कि हमें बाज़ार की ही चटपटी चीज़ें पसंद हैं| हमारी क्या आजकल के बच्चे और जवान तो three minute नूडल और फ़ास्ट फ़ूड के दीवाने हैं| अब यह तो सरकार को चाहिए कि इन की बिक्री पर रोक लगाए| सरकार चाहे तो हल्दीराम और McDonald जैसी कम्पनियों पर ‘Diabetes tax’ लगा सकती है| सरकार की भला ऐसी क्या मजबूरी है कि ऐसे फ़ूड को बैन नहीं कर पाते, और हम से उम्मीद करते हैं कि हम अपना खान पान बदल डालें | अजीब धान्धलेबाज़ी है!

और सुनिए – ब्रेकफास्ट भारी, लंच हल्का और डिनर बहुत लाईट – ऐसी सलाह दी गई| ये बातें आप के लिए कोई नई नहीं हैं और हम भी कई बार पहले सुन चुके हैं, परन्तु फिर भी हम लोग उस का कुछ उलटा ही करते हैं| हमारा रात का खाना एक तो बड़ा ‘हैवी’ होता है, दूसरे  बहुत लेट| खाने के साथ पीने का मसला भी रोज़ सामने आता रहता है | मेरा मतलब आप समझ ही गए होंगे, मैं कोई पानी की बात नहीं कर रहा हूँ, लेकिन इस में डॉक्टरों ने कुछ छूट दे रखी हैं| दो पैग प्रति दिन, हफ्ते में ५ दिन – वैसे थोड़ी बहुत cheating तो चलती है – पैग ‘पटियाला’ भी तो हो सकता है!

एक दो ‘ड्रिंक’ के बाद जब हम लोग खाने पर ‘टूटते’ हैं तो महाभारत के भीम भी देख कर शर्मा जाएँ|  

हमारी मजबूरी यह कि खाना खाते ही नींद  आने लगती है जबकि डॉक्टर साहब के अनुसार खाना खाने के कम से कम दो घंटे बाद सोना चाहिए|  

एक और बात : खाने में करेला और मेथी के  इस्तमाल का ज़िकर किया गया, कि दोनों बड़े लाभकारी हैं, परन्तु स्वामी रामदेव के बताये तरीकों पर संदेह प्रगट किया गया था| हालांकि उन के नाम का आजकल डंका है| और बहुत सारे  लोग हल्दी और लौकी पर निर्धारित आयुर्वेद की औषधियों को ऐसी बीमारियों में काफी असरदार समझते हैं| विदेशों में भी इन की डिमांड बढ़ रही है, तो उन्हें नकारना Allopathic या वेस्टर्न medicine की मजबूरी हो सकती है क्या?

मिठाईयों की  बात करें तो उन की ऐसी बीमारियों में पूरी मनाही है | ख़ास तौर पर diabetic के लिए ज़हर का काम करती हैं|

अब आप ही बताईये हम भारतीय लोग लड्डू, जलेबी या बर्फी, रसगुल्ले से कैसे दूर रह सकते हैं? केक और चोकलेट के दीवाने भी कम नहीं हैं|

अपने आप को बड़ा मजबूर पायाजब दुसरे दिन गुरद्वारे पहुंचे| एक तो गर्म गर्म हलवे का स्वादिष्ट मीठा प्रसाद और उस के पश्चात लंगर में मोटी मोटी जलेबी| अब भला कैसे छोड़ें ?

डॉक्टर के शब्द कानों में गूजने लगे| सावधान!! इसलिए जब दूसरी बार जलेबी देने वाला सेवादार आया तो हम ने दिल पर पत्थर रख उसे मना कर दिया| परन्तु वह जूँ जूँ हम से दूर जा रहा था हमारी ‘भूखी’ आँखें उस का पीछा कर रही थीं और साथ में एक फ़िल्मी गाने के बोल भी दिमाग में आ रहे थे …

हाय रे इंसान की मजबूरियां, पास रह कर भी है कितनी दूरियां|”

 

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Posted by on Jun 14 2018. Filed under Community, Featured, Hindi, Humour. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Responses are currently closed, but you can trackback from your own site.

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