होम डिलिवरी, और ऑन लाइन शॉपिंग…

संतराम बजाज

“लो, भई Amazon अब Australia भी आ गया|”, शर्मा जी ने खबर सुनाई|

“यह किस बला का नाम है? क्या Trump ने कोई नया तीर छोड़ा है”, हम ने अनजान बनते हुए पूछा.

“जी नहीं, ऑन लाइन शॉपिंग और डिलीवरी के गुरू Amazon, जो भारत में पहले ही धूम मचा चुके हैं | वह होम डिलीवरी की दुनिया में तहलका मचा देंगे| बस टेलेफोन पर बुक करो और सामान घर में|”

“पर ऐसी तो पहले ही कई कम्पनियां हैं, होम डिलीवरी कर देती हैं|पिज़्ज़ा और फास्ट फ़ूड, अखबारों वाले घरों में पेपर देते आ रहे हैं| दूध वाला (Milkman) बेचारा अब गायब हो गया है| लेकिन कई जगहों पर एक डेरी नुमा वैन| डाक खाने वाले तो सदियों से यह काम करते आ रहे हैं (अमेरिका में तो वे चिठियाँ घर से ले भी जाते हैं, आप को लैटर बॉक्स तक जाना भी नहीं पड़ता)

इस के बारे में बहुत पहले मैं ने तो एक लेख भी लिखा था – ‘होम डिलिवरी डॉट कॉम’| जिस की कुछ ख़ास ख़ास बातें आप की याददाश्त ताज़ा करने के लिए बताता हूँ|

होम डिलीवरी की प्रथा सब से पहले भारत में ही शुरू हुई थी|

सुबह सवेरे सिर पर टोकरी में रख या रेहड़ी पर ताज़ा साग सब्ज़ी बेचने वाले, पहुँच जाते हैं|

साईकल पर वह “चाकू छुरियाँ तेज़ करा लो” वाले  की आवाज़ सुन कितने घरों की रसोईयों से लोग बाहर आ जाते थे| घर बैठे बिठाए जूते चप्पल रिपेयर करने वाला मोची, कपडे प्रेस करने वाले धोबी, बर्तन कलई करने वाले (भांडे कलई करा लो!) आ जाते थे | गोल गप्पे (पानी पूरी)-चाट वाले, आईस क्रीम कुल्फी वाले, गुड़ की गचक और वह बड़े सारे बांस पर रंगदार गट्टा लिए आप के घरों के बाहर घूमते फिरते थे|

और वह बड़ी सी घंटी बजाता और ढोल बजाता मुनादी वाला – क्या ये होम डिलीवरी नहीं थी?  यहाँ तक कि विद्या देने के लिए घर में शिक्षक अर्थात घर में ट्यूशन| मेरे एक टीचर मित्र ने स्कीम सोची थी कि एक रेहड़ी ले गलियों में जा कर “बच्चे पढ़वा लो” की आवाज़े लगा विद्या की ‘होम डिलीवरी’ करेंगे|

बच्चे तो बहुत सारे गाँवों में अभी भी दाई माँ ही होम-डिलीवर करती हैं| शहरों में उन्होंने यह काम अस्पताल वालों को ‘आउट सोर्स’ कर दिया है|

और पैसा दूर दूर तक हुंडी द्वारा तरुंत पाने वाले के घर पहुँच जाता था|

घर में ग्रासरी चाहिए, गली के दुकानदार को पर्ची दे आये और आँख झपकते ही उस का आदमी सामान आप के घर देने आ जाता है| और कितनी मिसालें दूं आप को होम डिलीवरी की?”

“अजी यह तो मामूली बातें हैं, और उन के लिए आप को इंतज़ार भी करना पड़ता है कि कब गोलगप्पे वाला आयेगा, क्या भरोसा दूसरी गली से ही वापिस चला जाए| या फिर धोबी का कोयला ख़त्म हो गया है तो आप ‘मुचडी’ हुई शर्ट पहन कर दफ्तर जायेंगे क्या? और जब अचानक आप को किसी चीज़ की ज़रुरत पड़ जाए तो क्या करेंगे? अजी, Amazon वाले तो जब आप चाहें, बस मोबाईल का बटन दबाएँ और और कुछ ही समय में आप की जरूरत का सामान आप तक पहुंचा| ये लोग खाने पीने की ही नहीं, कुछ भी चाहिए, आप तक पहुंचा सकते हैं| आप ये क्या बावा आदम के जमाने की छोटी छोटी मिसालें ले आये है|”.

“छोटी बातें?  अच्छा बड़ी बात सुनिए और वह भी बहुत पहले यानि बावा आदम के जमाने की |”

रामायण में रावण के बेटे मेघनाथ (इन्द्रजीत) के हाथों लक्ष्मण के मूर्छित होने पर क्या हुआ था, याद है आप को?  हनुमान जी रातों रात लंका के वैधराज  को उठा लाये थे और फिर उस की बताई हुई औषधि (संजीवनी बूटी) का पूरा पहाड़ ही उसी रात ले आये थे | बताईये है कोई आप के पास ऐसी होम डिलीवरी का उत्तर?”

“खैर मैं इस बहस में नहीं पड़ना चाहता और हम आजकल में रह रहे हैं, तो उस की ही बात करें| मैं Amazon की बात कर रहा था, यह बड़ी धाँसू कम्पनी है| एक दिन में, और कभी कभी तो एक घंटे में डिलिवरी कर देते हैं”

“यानी जैसे आप  सुबह दांत साफ़ करने लगे हैं और देखा कि टूथ पेस्ट खत्म हो गया है, उन्हें फोन कीजिये और इस से पहले कि आप बाथरूम से बाहर आयें, आप के दरवाज़े पर खटखट हुई कि ‘Amazon-the Amazing’ की डिलीवरी सर्विस हाज़िर है,” हम ने बड़े ड्रामाई अंदाज़ में कहा|

“कुछ ऐसा ही समझ लीजिये, अरे यह तो कुछ भी नहीं, Amazon वाले छोटे छोटे ‘ड्रोन’- अरे वही बैटरी से चलने वाले छोटे हेलिकोप्टर – पर  प्रयोग कर रहे हैं, उन के द्वारा तो वह कुछ ही मिनटों में, यानी तत्काल डिलिवरी भी कर दें, ज़रा  इमेजन कीजिये कि आप टायलेट सीट पर बैठे हैं और आप का टायलेट पेपर फिनिश है, आप को नर्वस होने की आवश्यकता नहीं, झट से आर्डर टैप कीजिये और आप का ‘कार्य क्रम‘ ख़त्म हो, इस से पहले खिड़की के बाहर, ड्रोन मंडरा रहा होगा और आप अपना हाथ बढ़ा टायलेट पेपर ले अपने चेहरे की खुशी बाथरूम के शीशे में देख सकेंगे|

“और यदि ‘ड्रोन’ की बैटरी रास्ते में ही डाउन हो गई और वह खिड़की तक नहीं पहुँच पाया, तो? – हा! हा!!

शीशे तक पहुँचने के काबिल ही नहीं रहेंगे” हम हंसे, “चलिये छोडिये, मैं भी बहस नहीं करना चाहता परन्तु  मुम्बई के ‘डब्बेवालों’ के बारे में तो सुना ही होगा आप ने? दुनिया में इस की मिसाल कहीं और नहीं मिलती| आप के Amazon का बाप भी यह काम नहीं कर सकता कि करीब २ लाख खाने के टिफ़िन, २ लाख घरों से इकठे कर, दो लाख लोगों को उन के दफ्तरों में पहुंचाए ,फिर शाम को वही टिफ़िन उन लोगों के दफ्तरों से ले उन के घरों में वापिस पहुंचाए|एक बार नहीं, बल्कि बार बार – सप्ताह में ६ बार!  मजाल है कि पाटिल का डिब्बा पटेल को और सेठ का डिब्बा सेठी को मिले| अन्तर्राष्ट्रीय कंपनी Motorola के अनुसार उन में  ६० लाख डिलीवरी में एक गलती – अर्थात न के बराबर – २,३ महीने में शायद एक – पाई गई है, वे भी हैरान हैं!!

और एक बात और, इस से करीब ५ हजार लोग अपनी रोजी रोटी कमा अपने परिवारों का पेट भर रहे हैं|

इसे कहते हैं होम डिलीवरी ! इस का लोहा तो इंग्लेंड के प्रिंस चार्ल्स भी मान चुके हैं| यहां तक कि डब्बा वालों के चीफ को कोमीला के साथ अपनी शादी में आने का न्योता भी दिया था|

और मैं माडर्न टेक्नोलोजी को नकारने की कोशिश नहीं कर रहा हूँ, इस के फलस्वरूप हमारे जीवन में बहुत सुविधाएं आई हैं और आती रहेंगी|

अब जैसे पानी, बिजली, गैस कितनी आसानी से बहुत सारे घरों में उपलब्ध हैं, बटन दबाओ या टैप को घुमाओ – सब तत्काल हाज़िर है| हो सकता है, ऐसे ही सब घरों में पाईप द्वारा दूसरी आवश्यक वस्तुएं जैसे दूध, टूथपेस्ट, ड्रिंक्स, और दवाईयां आदि भी पहुँच सकें |

वह होगी होम डिलवरी – शायद Amazon ही इस मामले में पहल करे|

या फिर शायद आप के ‘ड्रोन’ ही सही उत्तर हों, आने वाला कल ही बताएगा!

मैं ने उस लेख के अंत में मजाक में यह लिखा था कि “वह दिन दूर नहीं जब होमडिलीवरी एक नया मोड़ लेगी अर्थात आप ‘बच्चा डाटकाम“ पर अपनी पसंद का बच्चा आर्डर कर सकेंगे|”-

शायद अब वह समय आ ही गया है|

 

 

Short URL: http://www.indiandownunder.com.au/?p=10394

Posted by on Feb 2 2018. Filed under Community, Featured, Hindi, Humour. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Responses are currently closed, but you can trackback from your own site.

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