हाय ये बीमारियाँ (भाग २) – कान की सफाई   

 

…संतराम बजाज

एक बार पहले भी मैं इस विषय पर लिख चुका हूँ, कि तरह तरह की माडर्न बीमारियों ने परेशान कर  रखा है हर एक को| शायद ही कोई हो, जिसे कोई रोग न हो | और फिर उन्हें काबू में लाने के लिए, दवाईयों का सेवन,  भोजन करने की तरह आवश्यक हो गया है|

परन्तु जो बात मैं आज कहने जा रहा हूँ, वह थोड़ी सी हट कर के है |

बीमारी तो जो हो सो हो, जब उस के इलाज के लिए जाते हैं तो दवाई के ‘साईड इफेक्ट्स’(दुष्प्रभाव )  सुन कर जान निकल जाती है| ऐसी कोई दवाई नहीं जिसके के साईड इफेक्ट्स न हों|

यहाँ तक कि एस्प्रीन और panadol जैसी गोलियां,  जो हम चोकलेट की तरह खा जाते हैं,  के भी side effects हैं|

कई तो  ऐसी दवाईयाँ  हैं जिन के साईड इफेक्ट्स की लिस्ट इतनी लम्बी है कि यह सारा लेख उन के नाम लिखते लिखते ही खत्म हो जाएगा| आप को विशवास नहीं होगा पर मिसाल के तौर पर High Clesterol के लिए Crestor नाम की दवाई के 93 (11 बड़े और 82 मामूली) साईड इफेक्ट्स हैं -जिस में जोड़ों का दर्द, हार्टबर्न, बुखार, थकान, पेट की गैस, आँखों के आगे अँधेरा और किडनी तक बेकार होने की सम्भावना, आदी भी हैं |

परन्तु फिर भी डॉक्टर लेने को कहते हैं| उन का कहना है यदि आप हार्ट अटैक से मरना नहीं  चाहते तो इन दर्दो को सहना होगा|

मरता क्या न करता ! ले रहे हैं|

किन्तु इस का यह मतलब भी नहीं कि यह सारे side effects किसी एक को हो सकते हैं – बहुत सारों को इन में से एक भी नही होता, परन्तु सर पर एक तलवार की तरह इन का डर तो बना रहता है|

कुछ दिनों की ही बात है, कान में थोड़ी खारिश सी हुई, सोचा मैल जम गई है,  इसलिए थोड़ी रूई ले एक तिनके पर लपेट कान में डाल उसे घुमाने ही वाले थे की बेटी ने टोक दिया कि क्यों हम अपने कान का पर्दा फाड़ने जा रहे हैं और इन्फेक्शन भी हो सकती है|

सो डॉक्टर के पास गये,  उस ने कान में लाईट मार कर कहा कि wax है, और दो तीन दिन ड्राप्स डालिए और फिर आकर कान धुलवा लीजिये |

ड्रॉप्स ले आये, पांच पांच दोनों कानों में,  दिन में दो दो बार डाले और तीन दिन बाद वापिस डॉक्टर के पास|

यहाँ तक तो ठीक था, पर जब कान की सफाई या धुलाई की बात आई तो नर्स के हवाले किया गया|

मैं ने  नर्स से पूछा कि कैसे करेंगी ये सफाई, तो उस ने एक syringe दिखाकर कहा कि उसमें गर्म पानी भर साफ कर देगी – लो क्या तीर मारा,  मैं तो समझ रहा था कि कोई माडर्न मशीन होगी, पर निकली एक पिचकारी!

मुझे अपने गाँव का मांगेराम नाई याद आ गया जो बाल काटने और शेव बनाने के अतिरिक्त कई और काम भी करता था,  जैसे कान के बाहर वाले और नाक के अंदर वाले बाल,  आँखों के भरोटों के लम्बे सफेद बाल निकालता था और हाथ और पाँव के नाख़ून भी काटता था| साथ में कानों की मैल भी निकालता था|

इस के लिए एक छोटा सा ‘मोचना’, एक चिमटी और थोड़ी  सी रूई लेकर लोगों के कान साफ़ कर, उन में थोड़ा तेल डाल सब ठीक कर देता था|

मुझे याद आये वे कान साफ़ करने वाले एक्सपर्ट जो एक गोल सी तंग लाल रंग की टोपी पहने और  उस के चारों ओर लम्बे लम्बे  ‘टूल्स’,  कई तरह की सुलाखें, चिमटी, छोटे छोटे से चमच की तरह के बारीक सुवे से,  लटकाए पार्क्स में घूमते फिरते थे और लोग उन से बिना किसी भय के अपने कान साफ़ करवाते थे|

इन्फेक्शन’ किस चिड़िया का नाम है, किसी ने सुना भी नहीं था| कितना बड़ा खतरा मोल लेते थे अनजाने में वे लोग?

वैसे तो भारत में हर फील्ड के ऐसे एक्सपर्ट बैठे हैं| जैसे दांत निकलवाने से दांत लगाने तक के,  आँख दुखती हों या आँखों से पानी बहता हो, या आँख की बीनाई जा रही हो – चश्मा लगाना हो या उस का रिपेयर करना हो – उन सब के लिए ऐसे लोग आप को सडक के किनारे ही मिल जाएंगे | मालिश करने वाले –

याद आ गया  फिल्म ‘प्यासा’ का  वह  गीत , “सिर जो तेरा चकराए, या दिल डूबा जाये, आ जा प्यारे पास हमारे, काहे घबराए …तेल मालिश – चम्पी ! जानी वाकर ने  क्या  कमाल की एक्टिंग की थी उस गाने पर !

नर्स की आवाज़ ने झंझोड़ा ; बोली, “किस सोच में पड़ गये हो| इस छोटी सी syringe से डर  गये हो क्या?|”

मुझे ताओ आ गया,  मुझ से रहा न गया और मैं ने कह ही दिया, “अरे, डरना क्या?  क्या पुराने ज़माने के हथियार लिए बैठे हैं आप लोग,  यह तो मैं घर पर ही कर सकता था” |

“तो कर क्यों नहीं लिया, यहाँ क्यों आये फिर?”, नर्स गुस्से में बोली|

“सॉरी,  मेरा यह मतलब नहीं था”|

“हाँ, हाँ, मैं जानती हूँ | कान साफ़ कराना हो,  तो पहले यह  consent  फ़ार्म भर दो”, नर्स बोली|

मैं ने फ़ार्म ले देखा —

हैडिंग बड़ा interesting लगा| ‘Ear Irrigation Procedure’|

एक पेज पर नाम पता आदि, पर दुसरे पेज ने तो होश ही उड़ा दिए|

लिखा था कि कान धोते समय,कुछ ‘साईड इफ़ेक्ट्स’ हो सकते हैं,  जैसे

जी मतलाना’, उल्टी आना, ‘सिर चकराना ’-  ये तो कोई बड़ी बात नहीं है, ये तो आजकल हर दवाई से होते हैं, पर कान की नाली में trauma (क्षति या घाव) हो सकता है, कान का पर्दा फट भी सकता है, इन्फेक्शन हो सकती है, और कि wax पूरी तरह से न निकाली जा सके|  अब यह तो घबराने वाली बात थी न! जिस काम के लिए आये, यदि वह ही नहीं होता तो, हम यहाँ क्या झक मारने आये हैं|

लेकिन मैं पहले ही नर्स की सहानुभूति खो चुका था, इसलिए चुप ही रहा|

अब आप ही बताईये, मेरी क्या हालत हुई हो गी | वह जो कहते हैं ना, ‘ नमाज़ बकशवाने गये और रोज़े गले पड़ गये’|

परन्तु जो खतरा मैं अब सब कुछ जानने  के बाद लेने जा रहा था, क्या  कम था?

सच पूछिए तो, वहां से न भागे बनता था और न ही उस फ़ार्म पर हस्ताक्षर करने की हिम्मत हो रही थी|

यहाँ तो बीमारी से बड़े ‘साईड इफेक्ट्स’ थे|

इस से तो अच्छा है की कान की मैल कान में ही रहने दूं! या घर में ही एक पिचकारी से आपने आप ही सफाई कर लूं|

मैं अभी इसी शशोपंज में पड़ा हुआ था कि नर्स ने आकर बड़ी रुखाई से फार्म माँगा और मैं ने हडब्राहट में वह  झट से हस्ताक्षर कर उस के हवाले कर दिया|

अब कुछ नहीं हो सकता था|

वह एक अजीब तरह की पिचकारी और साथ में पानी गर्म रखने वाली कुछ तश्तरी सी लेकर आ गई| मैं उस के चेहरे पर उस कसाई  की मुस्कराहट देख रहा था जिसे अपना शिकार मिल गया हो और उसे तडपा तडपा कर आनंद लेगी|

उस ने मेरा एक कान पकड़ा और बड़ी बेदर्दी से syringe उस के अंदर घुसेड दी| मेरे मुंह से हल्की सी ‘कराहट’ सी निकली, पर उस ने कोई नोटिस नहीं लिया, बल्कि थोड़ा प्रेशर और बढ़ा दिया| आँखों में आंसू से आ गये| लेकिन दांत दबा कर सह गया|

“कैसा लग रहा है?”, नर्स ने पूछा|

जी में तो आया की कह दूं,  ’तुम्हारा मर्डर करने का दिल कर रहा है’, पर क्साई की छुरी के नीचे आये बकरे वाली  हालत थी इसलिए, “ओके”,  ही मुंह से निकाल सके|

नर्स के लिए शायद यह चैलेंज था, या यूं कहिये कि ‘आ बैल मुझे मार’ वाली स्थिति थी | उस ने दुसरे कान को ‘कब्ज़े’  में लिया और अटैक शुरू हो गया|

उस ने पिचकारी को इस जोर से दबाया कि पानी के दबाव से हमारी चीख निकल गई |

यह देख कर अब तो  नर्स भी घबरा गई और इस चक्कर में हाथ वाली syringe जमीन पर और पानी की तश्तरी मेरे ऊपर|

मैं घबराया तो पहले ही बैठा था, इस अचानक हमले से मैं कुर्सी  छोड़  भाग निकला और डॉक्टर की सर्जरी से बाहर|

…… वे अब भी मुझे शायद ढूँढ रहे होंगे| .

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Posted by on Sep 9 2017. Filed under Community, Hindi, Humour. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Responses are currently closed, but you can trackback from your own site.

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