मतलबी हो जा ज़रा, मतलबी


संतराम बजाज

कल एक फ़िल्मी गाने के बोल, “मतलबी हो जा ज़रा, मतलबी”, कानों में पड़े और मैं सोचों के समुन्द्र में गोते लगाने लगा|

यह गाना किस के लिए लिखा है?  हम पहले से मतलबी नहीं हैं कि इन्हें हमें बताने की आवश्यकता पड़ रही है कि हम मतलबी बन जाएँ|

यह गाना ,भारतीय नेताओं के लिय तो हो नहीं सकता, वे तो इस मामले में बहुत आगे हैं

उनकी ego बहुत बड़ी होती है, कार पर लाल बत्ती, सडक का ट्रेफिक रुकवा देना उन्हें बहुत अच्छा लगता है, चाहे उस में अस्पताल जाते हुए किसी बीमार को कितनी भी असुविधा हो — यह सब मत्लाबपन नहीं तो और क्या है?

ऐसे लोगों के लिए भी नहीं, जो भैंसों का चारा खा जाएँ और डकार तक न लें, उस प्रदेश सरकार के लिए भी नहीं हो सकता, जहां मंत्री की भैंस गुम होजाए और प्रदेश की सारी पुलिस उसे ढूँढने में लग जाए और रेप करने वाले बदमाशों को खोज निकलने में उन्हें दिक्कत हो|

वे नेता जो बड़ी बड़ी अवैध संपत्तियों के मालिक बन गये हैं, इस गाने पर हंस रहे होंगे, चाहे उन की कमाई दृग्ज़ से आई हो, या रिश्वत से, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता|

ऐसे सांसदों के लिए भी प्रेरणात्मक नहीं हो सकता, यह फ़िल्मी गीत, जो  जहाज़ में मन चाही सीट न मिलने पर कर्मचारी की चप्पलों से पिटाई करें और उस की गिनती पर अभिमान करे|

ज़ाहिर है, यह  संदेश उन नेताओं के लिए भी नहीं हो सकता, जो दल बदलते हैं अपने फायदे के लिए और दुहाई देते हैं जनता की भलाई की|

मैं भी इस से पहले एक बार इस  विषय पर, ‘स्वार्थी कौन?’, लिख चुका हूँ | उस में प्रश्नात्मक ढंग से प्रेरणा दी गई थी कि आप बस में चढ़ते समय या ट्रेन में बैठे, दूसरों की सुविधा का ख्याल रखें, यदि ऐसा नहीं करते तो शायद आप स्वार्थी हैं| विषय बड़ा उलझा हुआ है, इसलिए उस लेख में खुला छोड़ दिया था|

वैसे आजकल के तेज़ी से बदलते समाज में मतलबी की परिभाषा बदलती जा रही है| आजकल  की भाषा में बोलें तो  Generation X (१९६०-१९८० की पैदाइश) और Gen-Y (१९८०-२०००), वाले बड़े प्रेक्टिकल अर्थात मतलबी (?) हैं|

रिश्तों में भी स्वार्थीपन आ गया है | यहाँ तक कि माँ-बाप को भी एक सीढ़ी की तरह इस्तेमाल में लाया जाता है और मतलब निकल जाने के बाद अकेले छोड़ या नर्सिंग होम में ‘डम्प” कर दिया जाता है|

(इस विषय पर एक बहुत ही जबरदस्त फिल्म  ‘बाग़बान’ बनी थी )|

“मतलबी हो जा जरा, मतलबी”, उन्हें याद दिलाने की जरूरत नहीं,  पहले से ही ‘Me culture’ का बोलबाला है | मुझे सब कुछ चाहिए, बाकी सब जायें जहन्नम में ! पढ़े हुए को क्या पढ़ाना, वे  ‘Me  culture’ में विशवास रखते  हैं, न कि उस के उल्ट ‘We  culture’ में|

हम में से कितने किसी गरीब और भूखे को देख, मुंह दूसरी ओर नहीं कर लेते? हमें उन से क्या लेना देना?

कल दो खबरें पढ़ीं| एक में – दुबई में बसे एक भारतीय व्यपारी  ने १० व्यक्तियों की जान बचाईं, जिन के ऊपर हत्या का केस था| उस  बिजनेसमैन ने अपनी ओर से लाखों रूपये देकर उन्हें माफ़ी दिलाई|

दूसरी ख़बर मे –  इंग्लेंड में, भारतीय मूल के ही व्यक्ति ने एक नकली charity बना, लाखों की हेराफेरी कर लोगों  को लूटा| हो सकता है, यह गाना पहले वाले व्यक्ति के लिए हो!

पिछले सप्ताह एक फिल्म देखने गये, पीछे वाली रो में दो जवान से लोग बैठे, फिल्म की बजाये अपने में ज़्यादा ध्यान दे रहे थे| ज़ोर ज़ोर से बातें कर रहे थे| उन्हें इस बात की चिंता नहीं थी कि दूसरे लोग उन के इस व्यवहार से दुखी और अपसेट हो रहे हैं| उन्हें जब मना किया गया तो मरने मारने पर उतर आये| अब यह मतल्बीपन नहीं था क्या?

एक और बीमारी आजकल ‘सेल्फी’ की चल पड़ी है| फोटो के लिए हर जगह घुस जायेंगे और जो लोग कुर्सुयों पर बैठे हैं, उन से आगे जा उन का view भी खराब कर देंगे, और उन्हें इस बात की परवाह भी नहीं है|  है ना, मतलबी पन ?

शायद यह गाना ‘अन्ना हज़ारे’ के लिए था क्योंकि उन के साथी उन्हें छोड़  मनिस्टर, चीफ मनिस्टर और गवर्नर तक बन गये और वे बेचारे भूख हडताल ही करते रहे, और अब करीब करीब गुमनाम से हैं|

जब से मैं ने यह फ़िल्मी गीत सुना है, कुछ और  कन्फ्यूज़ हो रहा हूँ | मैं क्या करू, मैं जरा ज़माने से पीछे हूँ, हो सकता है, यह गाना मेरे लिए ही लिखा हो|  मैं अन्ना हज़ारे तो नहीं हूँ, पर उन की तरह ‘बेमतलब’ के काम करता रहता हूँ|

उसी गाने की दूसरी लाईन यह थी कि, “दुनिया की सुनता है क्यों, खुद की भी सुन ले कभी”| देखा कितनी प्रेक्टीकल सलाह दी है कि अपनी भी सुन | और उस  के बाद, “सूरज डूबा है यारो, दो घूँट नशे के मारो, रस्ते भुला दो सारे घरबार के – ग़म तुम भुला दो सारे संसार के|” तो किसी दुखी आत्मा के बोल लगते हैं, जिन्होनें ने मुझे  कुछ ज़्यादा  परभावित किया| मतलब यह कि, मतलबी होना ऐसा कोई गुनाह भी नहीं है| जब हम अपना ही हित नहीं चाहेंगे या परवाह नहीं करेंगे तो दूसरों की देखभाल कैसे कर सकेंगे और यह  दुनिया कैसे चलेगी?  क्या हम अपने आलू के परांठे इसलिए छोड़ दें क्योंकि  भारत के कुछ लोगों को भरपेट खाना नहीं मिलता| यह कोई मतलबीपन नहीं है, क्योंकि हम किसी के मूंह का निवाला तो नहीं छीन रहे, और फिर हमारे न खाने से दूसरों की सेहत पर क्या असर पड़ेगा| (हालांकि खाने वालों की सेहत पर ज़रुर असर पड़ रहा है – पंजाब में आंकड़ों के हिसाब से ३७.५% परुष और ३०% स्त्रियाँ, मोटापे की शिकार हैं|)  हम लखनऊ की कल्चर, ‘पहले आप, पहले आप’ के चक्कर में पड़ गये तो गाड़ी छूट जायेगी | गाड़ी से याद आया कि गाड़ी में चढ़ते समय या बस में सीट के लिये, क्या मतलबी हो कर दूसरों को पीछे धकेल कर, हर एक दौड़ धूप नहीं करता|

हालात के हिसाब से मतलबी का मतलब बदलता रहता है| तो क्या मैं अपने ही बारे में सोचूँ और गली के मोड पर बैठे भिखारी की ओर आँख उठा कर भी न देखूं ? अजीब कन्फ्यूज़न है भाई !

आप यदि मतलबी नहीं हैं  तो आप उस पक्के फल की तरह हैं, जिसे हर एक ही खाने की कोशिश करेगा|

खैर साहिब, मामला अभी सुलझा नहीं है|  मतलबी बन कर देखते हैं, राज कपूर का गाना -‘किसी की मुस्कराहटों पे हो निसार, किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार’ को भूल कर हम ने  ‘दो घूँट नशे के मारे’ और कार निकाल घूमने निकल पड़े| जूंही  मेन  रोड पर पहुंचे कि RBT पुलिस वालों ने रोक लिया| हमारी हवा सरकी|  driving licence चेक् करने के बाद मशीन में फूंक मारने को कहा, तो पसीने छूट गये|

भगवान का शुक्र कि खतरे की लेवल तक नहीं पहुंचे, नहीं तो रात पुलिस थाने में गुजारनी पड़ती|

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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Posted by on Apr 6 2017. Filed under Featured, Hindi, Humour. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Responses are currently closed, but you can trackback from your own site.

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