हिन्दी हमारी राष्ट्रीय भाषा

हिन्दी हमारी राष्ट्रीय भाषा

इस वर्ष ऑस्ट्रेलिया में हिंदी दिवस पर हमारी राष्ट्र भाषा हिंदी की धूमधाम रही। ऑस्ट्रेलिया के विभेन्न शहरों में तरह-तरह के उत्सवों का आयोजन किया गया, जिसमें हिन्दी प्रेमियों ने उत्साह पूर्वक भाग लिया। हिन्दी आज विश्व की सबसे ज्यादा बोले जाने वाली भाषाओं में दूसरे स्थान पर है, विश्व में करीब 600 मिलियन लोग हिंदी भाषी हैं। पिछली जनगणना के अनुसार ऑस्ट्रेलिया में करीब चालीस हज़ार व्यक्तियों की प्रथम भाषा हिन्दी है। हिन्दी के इतिहास पर नज़र डालें तो हिंदी का प्रादुर्भाव संस्कृत भाषा से हुआ व इसे सिन्धु कहा गया और फारसी भाषा में ‘स’ का उच्चारण न होने के कारण उन्होंने इसे सिंध से हिंद व फिर हिन्दी बना दिया। पिछले कुछ दशकों में हिंदी की स्थिति में बहुत परिवर्तन आया है, हिन्दी ने अपना रूप बदला है और अनेकों भाषाओँ के शब्दों ने इसे और अधिक समृद्ध बनाया है। हिन्दी एक व्यवस्थित भाषा है और इसके नियम लगभग निश्चित है। इसके शब्द भंडार में हिन्दी के मूल शब्दों की संख्या ढाई लाख से भी अधिक है। हिन्दी भाषा हमारे देश की संस्कृति और संस्कारों का प्रतिबिंब है, और इसे अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बहुत पसंद किया जाता है और आज विदेशों में भी विश्व हिन्दी सम्मेलनों का सफल आयोजन होता है। फीजी, मॉरिशस, गयाना, सूरीनाम और नेपाल में अनेक लोग हिन्दी भाषी हैं।
भारत सरकार द्वारा हिंदी भाषा को एकजुटता का माध्यम बनाने के लिए सन् 1949 में एक एक्ट बनाया गया जिसका उद्देश्य सरकारी कार्यों में हिंदी का प्रयोग अनिवार्य करना था। आज हिन्दी देश की राजभाषा है, भारत में तकनीकी क्रांति ने इसे इन्टरनेट के माध्यम से विश्व के कोने-कोने में पहुंचा दिया है।
आज हिन्दी की शिक्षा ऑस्ट्रलिया में दो यूनिट के रूप में हाई-स्कूल के विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध है, कुछ वर्ष पहले हिन्दी सिडनी विश्वविद्यालय में भी थी परन्तु अब वह प्रौढ़ शिक्षा का एक भाग बन कर रह गई है, यहाँ विभिन्न स्तरों पर हिन्दी सिखाई जाती है। कैनबरा और मेलबर्न में हिन्दी विश्वविद्यालय में पत्राचार या डिस्टन्स से सीखी जा सकती है।
- रेखा राजवंशी

दोहे

धुल भरे थे दिन कभी, शूल भरी थी रात
पुतली से बादल बिंधे, पलकों में बरसात।

हुई दीप सी ज़िंदगी, दीपशिखा सी सांस
जहां हुई थी प्रार्थना, वहीं जला मधुमास।

छोटी सी थी अंजुरी, बहुत बड़ी थी चाह
जाने कैसे खो गई, चौराहे पर राह ।
अनिल वर्मा

सेल

यहाँ नहीं
वसंत के रंग
सावन की रिमझिम
यहाँ नहीं होली की मस्ती
दीवाली की चहल पहल
बस है
एक फेस्टीवल
सेल सेल सेल
मेरे पड़ोस में रहने वाली
नब्बे वर्ष की बुढ़िया
दो-चार बरस
और मज़े से खींच जाती
परन्तु
पिछले वीक एंड
एक फ्यूनरल डायरेक्टर ने सेल लगाईं
मारे खुशी
सेल का फायदा उठाने
बुढ़िया उसी वीक एंडचल बसी ।
किशोर नंगरानी कैनबरा

पिता

पिता तो निमित्त है
वंश के प्रजनन का
प्रकृति के अमरत्व का
दर्द सूखी आँखों का
उसका कवच है
उसका परुष है
उसका त्याग
अकेला है वह
पुरुष है
पिता है वह।

-प्रेम माथुर, पर्थ

मुक्तक

दीप वो दीप है, जो जलके रौशनी कर दे
गुल वही गुल है जो, गुलशन में खुशबुएँ भर दे
ज़िंदगी यूँ तो, हर इंसान जिया करता है
आदमी वो है, जो मुर्दों में ज़िंदगी भर दे ।

- रेखा राजवंशी


नया प्रात

मिट्टी के घरोंदे
बनते टूटते रहे
सपनों की गठरी
लुटेरे लूटते रहे
पीड़ा की टोकरी
कंधे पर पड़ी-पड़ी
कुम्हलाई अभिलाषा
गर्मी में खड़ी-खड़ी
बालू से फिसल गए
कितने दिन रात.
विकलित मन ढूंढ रहा
कोई नया प्रात|

ज़िंदगी

ज़िंदगी धुंध है, कुंहासा है
मन समंदर है फिर भी प्यासा है.
ढूंढ़ते हम किसी को भीड़ में. भी
सब है यह तो महज़ दिलासा है|
सुबह है कह रहे हैं सारे लोग
क्यों फिर माहौल रात का सा है.
रौशनी तो शहर में काफी है
बस मेरा घर ज़रा बुझा सा है|

- रेखा राजवंशी

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Posted by on Nov 21 2010. Filed under Hindi. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry
  • KHUSHBOO

    GOOD

  • avanthika

    not bad

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